इस जगत का क्या नाम दूँ - विज्ञान जगत का प्रदुषण जगत। यह पढ़कर आपको भले ही अटपटे लगते हो लेकिन सच यह है कि विज्ञान जगत ने जीवन को सहज और सरल बना दिया है। मनुष्य जाति का यह प्रयास रहा है कि वह कम समय में अधिक कार्य करें, लम्बी दूरियां तय करें। यह सब संभव है तो विज्ञान के कारण जो हमारी आवश्यकता एवं कल्पना शक्ति का प्रतिफल है। 18वीं - 20वीं शताब्दी महान अविष्कार का युग रहा है। आज विज्ञान जगत ऊँचाईयों को छू रहा है और अपनी चरमोत्कर्ष पर पहुॅच चुका है। आज से करीब 1950-1960 के दशक
के अखबारों में प्रदूषण जैसी कोई शब्द इस्तेमाल नहीं होता था। लोग इन शब्दों से अपरिचित थे। लेकिन आजकल के समाचार पत्रों में पर्यावरण की हत्या, अद्योगिक दूर्धटनाए, वनोन्मूलन, महामारी, हैजा की दहशत, डेंगु की समस्या, जैसी शीर्षक से समाचार पत्र भरे रहते है। अभी हाल में ही परमाणु परीक्षण के कारण भूकंप के झटके पढ़ने को मिले है। इन सभी का मूल कारण प्रदूषण ही है। वैज्ञानिक इस बात से सहमत है। यह प्रदूषण मानवीय क्रियाकलापों का एक अन्य उपोत्पाद है। इन 60-70 वर्षो के अंतराल में इतना परिवर्तन हो गया है कि हम विज्ञान जगत को प्रदूषण जगत समझने लगे हैं। वैज्ञानिक विकास ने अत्यधिक प्रगति की है और प्रौद्योगिकी नई ऊँचाईयों को छूने लगी है। प्रौधिगिकी (टेक्नोलाॅजी) विकास के बिना औद्योगिक विकास संभव नहीं है। हम यह स्वीकार करते हैं कि प्रदूषण विकास से जुडा हुआ है। परन्तु इसकी एक सीमा भी है। मानव स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। प्रदूषण को सहन सीमा के भीतर रखना होगा। मानवीय क्रियाकलापों के कारण उत्पन्न प्रदूषण से अन्य जीव-जन्तु भी प्रभावित हो रहें है। हम जिस खुले हवा से प्राणदायक आॅक्सीजन ग्रहण करते है, उसके साथ-साथ मोटरकारों, अन्य पेट्रोलियम वाहन से निकले धुएॅ भी ग्रहण करते है। जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रहें है। चलित वाहनों से निकले धुओं में कार्बनडाईआॅक्साइड, कार्बन मोनोआॅक्साईड, सल्फर डाईआॅक्साईड और नाइट्रोजन के आॅक्साईड जैसी जहरीली गैसे मिली रहती है। इससे स्वास्थ्य संबंधी बिमारियों जैसे फेफडों में सूजन, फेफडों का कैंसर, दृष्टि बाधा, न्यूरोलाॅजिक्ल डिसआॅडर हो जाती है। सभी प्रकार के प्रदुषणों में वायु प्रदूषण को सबसे खतरनाक बताया गया है। अधिक वाहनों का उपयोग, छोटी दूरियों को तय करना वायू प्रदूषण का सबसे जिम्मेदार कारक माना गया है। अगर हम अभी से अपनी आवश्यकता को काबू नहीं कर पाये तो प्रकृति के जिस खुलेपन में हम जी रहें है, वहाॅ जहरीली हवा पीने को मिलेंगे। हम यह नहीं कह सकते है कि यह प्राकृतिक रूप है, बल्कि यह मानवीय क्रियाकलापों का प्रतिफल है। जिसका परिणाम हम सभी पर पड़ रहा है और आने वाले पीढ़ियाॅ इसे भुगतने को तैयार होंगे।
लेखक
सिम्पल कुमार सुमन
19.01.2017
लेखक
सिम्पल कुमार सुमन
19.01.2017
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