Tuesday, 31 October 2017

प्रकृति का समय: कल और आज





कल का समय:-
     सुबह की बेला है। चिड़ियाँ जग गई, शायद गाने के लिए। ठंडी-ठंडी हवा चल रही है। सूर्य किरणों की बौछारें लेकर धरती पर उतर रही है। यह धरती उज्जवलित हो रही है। पेड़-पौधे हवा में झूम रहे है। जीवों का सामान्य जीवन-क्रम चल रहा है। चाहे उड़ने वाले हो, चाहे दौड़ने वाले हो, चाहें रेंगने वाले अथवा तैरनेवाले, ये सभी जीव अपने में काफी खुश दिख रहे हैं। इतना ही नहीं प्रकृति का नजारा कुछ और भी है। नदियाँ इठलाती हुई बह रही है। मछलियाँ स्वतंत्र जल में तैर रही है। कुछ बच्चे समूहों में तैर रहे है। पनभरियाँ पानी भर रही है। कहीं नालों से खेतों की सिंचाई हो रही है, तो कहीं फसल लहलहा रहे हैं। वसंत ऋतु में पुष्प अपने सुगंध से प्रकृति को सुवासित कर रही है। भौरें गुनगुना रहे हैं। पेड़ों से नये पत्ते निकल रहें है। कोयल की मीठी बोल से प्रकृति में मिठास आ गया है। एक के बाद एक ऋतु समय पर आते-जाते हैं। कहीं कोई कलह नहीं। सब शान्तिमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हर जगह सामंजस्य तथा सौहार्द्रपूर्ण माहौल है। अहा! प्रकृति का यह दृश्य कितनी मनोरम है। इस नैसर्गिक दृश्य ने मेरे नाम को मोह लिया है। अतः हम चाहते हैं कि प्रकृति का यह दृश्य हमेशा बनीं रहे।
आज का -समय:
      किन्तु समय की कुचक्र में मनुष्यों के कारण प्रकृति की दशा और दिशा बदल गई। इस विज्ञान युग में भौतिकता का काफी्र विकास हुआ है। भौतिक वस्तुओं की उपयोगिता ने मनुष्य की मनोःस्थिति बदल दी। मनुष्यों की अत्यधिक लालसाओं, इच्छाओं के कारण प्रकृति के छेड़-छाड़ हुआ है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त  संसाधन यथा-हवा, जल, जमीन, जंगल हम सभी जीवों की अस्तित्व के लिए आवश्यक है। इसकी नैसिर्गिक गुणवत्ता  में थोड़ी-सी बदलाव आकस्मिक परिवर्तन को अंजाम देती है। चूँकि हम जानते है कि प्रकृति की नैसर्गिक गुणवत्ता  इसकी प्रमुख विशेषता है। सचमुच हमलोग विज्ञान युग में पहुँच गए हैं। चहँु ओर परिवर्तन-ही-परिवर्तन नजर आते है। मशीन युग में सुविधा काफी मिल रही है। भौतिक वस्तुओं की भरमार लगी हुई। ये सभी वस्तुएँ मूल रूप से कृत्रिम है। अतः ये सुविधाएँ नैसर्गिक नहीं हैं।  बढ़ती जनसंख्या के दबाव के कारण प्रकृति के मनोरम दृश्य  नष्ट होते जा रहें हैं। मनुष्यों की भारी क्रियाकलापों से प्रकृति को काफी धक्का लगा है। धरती से लेकर अंतरिक्ष तक परिवर्तन देखने को मिला है। मौसम का तो अपना मिजाज हो गया है। कब मौसम असमय बदल जाय, यह कहना मुश्किल है। असमय ऋतु-परिवर्तन ने तो चिंतनीय विषय बना डाला है। ऋतु परिवर्तन चक्र अंसतुलित हो गया है। विभिन्न ऋतुओं जैसे गर्मी, ठंडी, वर्षा, बसंत आदि का समय बदल गया है। कैलेण्डर के मुताबिक ऋतु-अंतराल में भी परिवर्तन देखने को मिला है। ठंडी समय से पहले ही गिर जाती है। गर्मियों में सूर्य प्रचंड ताप से जीव-जंतुओं को परेशानी में डाल देता है। पेड़-पौधे सूखने लगते है। जबकि शीत में पाले मारते है। ऋतु-चक्र परिर्वतन के कारण फसल अंतराल चक्र में परिवर्तन हुआ है। परिणामवश फसल की वृद्धि प्रभावित हुई है। मानों कि प्रकृति ने अपना मुँह मोड़ लिया है तथा विकाराल रूप धारण किया है। इसका मतलब है कि प्रकृति हमसे रूठ गई है। हमें उन्हें मानाना होगा। हमें उन्हें खुश  करना होगा। प्रकृति की रक्षा करने से ही हमारी रक्षा होगी। प्रकृति के प्रत्येक जीव हमारे मित्र हैं। ऐसी भावना रखनी चाहिए। सदा उनके संसर्ग में रहना होगा। हम जानते है कि प्रकृति सर्वशक्शिाली तथा सर्वगुणसम्पन्न हैं। यह संपूर्ण-संसाधनों से भरपूर है। किन्तु आधुनिक मनुष्य प्रकृति को हर तरह से चुनौदी दे  रही है। हम उनकी ही संसाधनों से उन्हें दबाने की कोशिश कर रहें है। सुविधापरस्त लोग कृत्रिम वातावरण तैयार करने के लिए विभिन्न यंत्रों एयरकंडीशनर, फ्रीज, पंखा, कूलर इत्यादि का उपयोग करते हंै। यह कृत्रिम वातावरण प्राकृतिक वातावरण से भिन्न होते हैं। अर्थात् दोनों एक जैसे नहीं होते हंै। उदाहरण के लिए विभिन्न यंत्रों से हम कमरे या कार को वातानुकूलित करते है। यहाँ कमरे/कार को छोटी निकाय तथा प्रकृति को बड़ा निकाय समझें। हम जैसे ही छोटे निकाय से बड़े निकाय अर्थात् वातनुकूलित क्षेत्र से प्राकृतिक निकाय में जाते है तो शरीर में अचानक परिर्वतन होने लगते हैं।
      इससे हमारे शरीर में अचानक परिवर्तन आने लगते है। अतः हमें प्रकृति में (खुले निकाय) में ही रहना चाहिए। संपूर्ण प्रकृति परिस्थितिक तंत्र से जुड़ हुआ है। थोड़ी-सी गड़बड़ी विकराल रूप ले लेती है। बहुत कारणों से पारिस्थितिक तंत्र अंसतुलित हो चुका है। अब तो बड़ी-बड़ी भयंकर परिवर्तन होने लगा है। विश्व में ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीन गृह प्रभाव, अम्लीय वर्षा, हिमस्खलन, भूस्खलन, चक्रवात इत्यादि हो रहा है। इससे वन तथा वन्य जीवों को काफी नुकसान हुआ है। जीवों की कई प्रजातियाँ भी लुप्त हो गई है। पेड़-पौधों जो कल हरा-भरा था, चिडियाँ घोंसला बनाती थी, अब वह वीरान जैसी लगती है तथा सूख चुके हंै। दरवाजे तथा आस-पास के मोटे-मोटे पेड़ अब कटने लगे है। वृक्षारोपण से ज्यादा कटाई की दर ज्यादा है। फलस्वरूप वनों का प्रतिशत घटा है। आज कल जो भी भूमि खाली पड़ी है घर बनये जा रहें तथा कारखाने खोले जा रहे है अथवा कृषि योग्य भूमि में बदल दिया गया है। यह कुप्रक्रिया अब तेज हो गई हैं। इस समय कई पर्यावरणीय संगठन कार्य कर रही है। किन्तु अलग-अलग तरीके से । अगर जनसंख्या का बहुसंख्यक भाग इस कार्य के लिए और तो हम प्रकृति को गिरते खाई से बचा सकते है।
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सिम्पल कुमार सुमन




























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